Movie Review : अक्षय कुमार की हाउसफुल 4

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हिंदी सिने जगत में सफल फिल्‍मों की नाम सीरीज निर्माता निर्देशकों के लिए सोने के अंडे देने वाली मुर्गी है और हिंदी सिनेमा प्रेमियों के लिए सफल फिल्‍म की अगली किश्‍त कहीं न कहीं सेफ और सिक्युर डील जैसी होती है। इस तरह की फिल्‍मों को त्‍यौहारी मौसम रिलीज किया जाता है, ताकि कभी कभार फिल्‍म देखने वाले दर्शक भी फिल्‍म का आनंद ले सकें और निर्माता निर्देशक भी अच्‍छी कमाई कर सकें।

इस दीवाली पर भी सुपरहिट फिल्‍म हाउसफुल का चौथा संस्‍करण हाउसफुल 4 को रिलीज किया गया है और मेगाबजट फिल्‍म हाउसफुल 4 का प्रचार भी बड़े पैमाने पर किया गया। लेकिन, क्‍या हाउसफुल 4 दर्शकों को हाउसफुल सीरीज की अन्‍य फिल्‍मों सा मनोरंजन करवाती है? चलो, इसी सवाल पर बात आगे बढ़ाते हैं।

हाउसफुल 4 का प्‍लाट पुराना है, तीन गरीब लड़के और तीन अमीर लड़कियां। इन लड़कों का मकसद अमीर लड़कियों से शादी करना और अमीर बनना है। प्‍लाट को रोचक बनाने के लिए 1419 और 2019 के दो काल खंड लिए गए हैं। 1419 के काल खंड में कहानी का नायक राजकुमार है और वर्तमान में हेयर ड्रेसर।

फिल्‍म का निर्देशन फरहाद ने किया है, जो इससे पहले एंटरटेनमेंट और हाउसफुल 3 का निर्देशन कर चुके हैं। फरहाद को निर्देशन से दूर रहना चाहिए। फिल्‍म को लिखा भी फरहाद ने है। हैरानी की बात है कि कहानी को 1419 में लेकर जा रहे हैं, और फरहाद की संवाद लिखने की क्षमता 1990 के दशक से पीछे नहीं जा पा रही।

कहानी साजिद नाडियाडवाला ने सारा बोडिनार के साथ मिलकर लिखी। अगर, यह कहानी है तो ऐसी कहानी तो पांच दस फिल्‍में देखने के बाद कोई भी लिख देगा। दरअसल, यह कहानी नहीं, बल्कि सफल फिल्‍मों के वाहियात संस्‍करणों का संकलन है।

फिल्‍म कितनी वाहियात होने जा रही है, फिल्‍म शुरूआती 15 मिनट में साफ कर देती है। इंटरवल तक फिल्‍म पूरी तरह पकाती है। इंटरवल के बाद फिल्‍म थोड़ी सी संभलने लगती है। लेकिन, खुद को ज्‍यादा समय तक संभाल नहीं पाती है।

अंतिम पंद्रह बीस मिनट के दौरान फिल्‍म हाउसफुल सीरीज के रंग में आती है। दर्शक खुद को ख़तरे बाहर महसूस करते हैं। लगता है कि संपादन के दौरान जब एडिटर ने पूछा होगा, यहां कौन सा सीन फिट किया जाए, तो आवाज आई होगी, चलो एक और गाना डाल दो।

अभिनय की बात करें तो अक्षय कुमार अंतिम दस पंद्रह मिनटों और बीच के कुछ कुछ सीनों में बेहतरीन अभिनय करते हुए नजर आए। शुरूआती सीनों में बॉबी देओल की आवाज में सनी देओल की आवाज सा एहसास होता है। बाद में निर्देशक को याद ही नहीं रहता, और बाद में बॉबी देओल अपनी आवाज में संवाद बोलते हैं। मनोज पाहवा ने अपने किरदार को बेहतरीन तरीके से अदा किया। जॉनी लीवर जैसे बेहतरीन कॉमेडी से भी फरहाद काम नहीं ले पाए।

साजिद नाडियाडवाला ऐसी कहानी लिखने से बेहतर है कि चार पांच अच्‍छी फिल्‍मों के राइट्स खरीदो और उनका मैशअप रिलीज करो। कम से कम दर्शक पहले से तैयारी करके जा सकें कि हमको पुराना ही देखना है, और उसकी गुणवत्‍ता के साथ।

कुल मिलाकर कहें, हाउसफुल 4 मनोरंजक नहीं, बल्कि दर्ददायक फिल्‍म है, जिसको देखते हुए महसूस होता है कि आते हुए साथ में एक नींद की या सिरदर्द की गोली लेकर आते, कम से कम कुछ राहत तो रहती।

– कुलवंत हैप्‍पी  | filmikafe@gmail.com | Facebook.com/kulwanthappy | Twitter.com/kulwanthappy|