Movie Review : देवा कट्टा और संजय दत्‍त की प्रस्‍थानम

0
317

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में राजनीति और राजनीति शब्‍द को नकारात्‍मक रूप में दिखाया जाता है क्‍योंकि राजनीति में छल कपट सब कुछ जायज होता है, कुछ भी नाजायज नहीं होता। देवा कट्टा निर्देशित प्रस्‍थानम भी राजनीतिक घराने के इर्दगिर्द घूमती है।

बलदेव प्रताप सिंह लखनऊ के जाने माने राजनेता हैं। बलदेव प्रताप सिंह के दो बेटे हैं आयुष्‍मान और रघुवीर। आयुष्‍मान बलदेव का सौतेला बेटा है, जो राजनीति में अधिक सक्रिय है, और बलदेव की नजर में राजनीति में आयुष्‍मान ही बलदेव का उत्‍तराधिकारी होगा जबकि रघुवीर, जो क्षुब्‍ध, नशेड़ी और सनकी किस्‍म का है, वो आयुष्‍मान की जगह खुद को देखना चाहता है।

रघुवीर हमेशा सोचता है कि उसके पिता उसकी अनदेखी करते हैं। रघुवीर हीनभावना से भरा हुआ और नशे में डूबा रहने वाला युवक है। रघुवीर और आयुष्‍मान में शीत युद्ध चलता रहता है। इस घरेलू तनातनी का फायदा बलदेव का पुराना दोस्‍त और कारोबारी खत्री बाजवा उठाने लगता है। उधर, सनकी बेटा रघुवीर बलदेव के वफादार बादशाह की बेटी का रेप करता देता है। खुद को इस मामले में बचाने के लिए रघुवीर और भी गुनाह करता है। ऐसे में बलदेव की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं और इन मुश्किलों से बलदेव किस तरह छुटकारा पाता है, जानने के लिए प्रस्‍थानम देखनी होगी।

राजनीति पर आधारित प्रस्‍थानम की कहानी सशक्‍त है, लेकिन, पटकथा कहानी के साथ इंसाफ करने में असफल रहती है। हर मोड़ पर लगता है कि कहानी किक देगी, लेकिन, अगले ही सीन में कहानी का जोश ठंडा पड़ जाता है। संजय दत्‍त पर अधिक फॉक्‍स करने में चक्‍कर में कहानी के अन्‍य किरदार दब गए।

अली फजल अपने किरदार में काफी प्रभावशाली नजर आते हैं। हालांकि, ऐसा किरदार अली फजल मिर्जापुर में निभा चुके हैं। सत्‍याजीत दुबे ने सनकी युवक के किरदार में जान डालती है। एक समय पर तो सत्‍याजीत दुबे के किरदार से घृणा होने लगती है। मनीषा कोईराला के लिए अधिक कुछ नहीं था। जैकी श्रॉफ को फिल्‍म में सजावटी आयटम की तरह रखा गया है। चंकी पांडे के किरदार को दमदार और शानदार बनाया जा सकता था।

जहां जैकी श्रॉफ और मनीषा कोईराला के किरदार बेहतर तरीके से लिखने की जरूरत थी, वहीं, गानों पर सख्‍ती से कैंची चलाने की जरूरत थी। कहानी को रनवे से हवाई जहाज की तरह उड़ान भरवाने और लैंडिंग करवाने की जरूरत थी, जिसमें निर्देशक और लेखक दोनों की चूक गए।

कहानी का अंत चुपके से बहुत कुछ कहता है। फिल्‍म को यदि दर्शक खुद समझने बैठे तो कहानी कुछ अलग तरह से उभर कर आती है। फिल्‍म अंतिम क्षणों में समय बांधती है। लेकिन, तब तक दर्शकों का दिमाग हजारों सवालों से भर चुका होता है।

यदि आप राजनीति और अपनों के बीच भौतिक सुख को लेकर चलने वाली कलह देखना पसंद करते हैं तो प्रस्‍थानम देख सकते हैं यदि आप सिनेमा से अधिक उम्‍मीदें रखते हैं, तो प्रस्‍थानम का झोल भरा स्‍क्रीन प्‍ले आपके दिमाग का दही कर सकता है।

  • कुलवंत हैप्‍पी