Movie Review! साहेब, बीवी और गैंगस्टर 3 : न साहेब न गैंगस्टर

Spread the love

हासिल जैसी बेहतरीन फिल्म के साथ बतौर निर्देशक नयी पारी शुरू करने वाले फिल्मकार तिग्मांशु धुलिया ने साहेब, बीवी और गैंगस्टर से बॉक्स आॅफिस पर धूम मचा दी थी। इस फिल्म की सफलता से उत्सुक तिग्मांशु धुलिया ने साल 2013 में साहेब, बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स के नाम से इस कहानी को आगे बढ़ाया और दर्शकों ने फिल्म को खूब पसंद किया। पिछले साल रागदेश के फ्लॉप होने के बाद तिग्मांशु धुलिया ने अपनी सुपरहिट सीरीज की अगली किश्त पर काम शुरू किया और साहेब, बीवी और गैंगस्टर 3 के रूप तीसरी किश्त सामने आयी।

कहानी
कुंवर आदित्य प्रताप सिंह (जिम्मी शेरगिल) जेल में है। माधवी देवी (माही गिल) के हाथ में सत्ता और राजमहल की बागडोर है। माधवी चाहती है कि आदित्य जेल से बाहर न आए। इसके लिए माधवी खूब प्रयास करती है। लेकिन, आदित्य तिगड़म लगाकर जेल से बाहर निकल आता है।

इसी बीच आदित्य की दूसरी बीवी रंजना को गोली लग जाती है। जेल से छूटने के बाद आदित्य और माधवी के बीच शारीरिक संबंध बनते हैं, जो आदित्य और माधवी को न चाहते हुए भी एक आंगन में रहने के लिए मजबूर करते हैं।

मगर, माधवी आदित्य को खत्म करने के लिए प्रयास करने बंद नहीं करती है। आदित्य को खत्म करने के लिए माधवी एक जाल बुनती है। अपनी खोई हुई चमक हासिल करने का भूखा आदित्य इस जाल में फंस जाता है। आदित्य, कुंवर उदय सिंह (संजय दत्त) से मौत का खेल खेलने के लिए तैयार हो जाता है। उदय सिंह इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी है।

क्या कुंवर आदित्य सिंह मारा जाएगा? क्या आदित्य सिंह माधवी की चाल को समय रहते समझ जाएगा ?इन सवालों का जवाब जानने के लिए साहेब बीवी और गैंगस्टर 3 देखनी होगी।

निर्देशन
तिग्मांशु धुलिया बेहतरीन निर्देशकों में शामिल हैं। लेकिन, साहेब, बीवी और गैंगस्टर 3 में​ तिग्मांशु धुलिया निराश करते हैं। फिल्म की पटकथा बेहद कमजोर है। फिल्म मध्यांतर तक केवल चेहरों का परिचय चलता रहता है, जो बोर करता है। एक झलक दिखाने के बाद चेहरे लापता हो जाते हैं। दो परिवारों की कहानी को एक दूसरे की पूर्वक बनाने में तिग्मांशु धुलिया और संजय चौहान बुरी तरह असफल हुए हैं। हालांकि, फिल्म के कुछ संवाद बेहतरीन है और प्रभावशील हैं।

अभिनय
माधवी का किरदार काफी दमदार और रहस्यमय था। लेकिन, माही गिल प्रभाव पैदा करने में असफल रही हैं। जिम्मी शेरगिल्ल और संजय दत्त का अभिनय औसत दर्जे का है। संजय दत्त के किरदार को बेहतर तरीके से लिखने की जरूरत थी। चित्रांगदा सिंह सुहानी के किरदार में थोड़ी सी ठीक ठाक लगती हैं।

अन्य पक्ष
फिल्म का गीत संगीत ठीक ठाक है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी बेहतरीन है। फिल्म संपादन भी निराश करता है। फिल्म का आर्ट वर्क और कॉस्ट्यूम चयन भी निराश करता है। कहीं भी शाही एहसास नहीं होता है।

चलते चलते
यदि आप साहेब, बीवी और गैंगस्टर सीरीज के दीवाने हैं और इस सीरीज का पुराना स्वाद गंवाना नहीं चाहते हैं, तो इस फिल्म को देखने से बचें। इस फिल्म को देखते हुए काफी धैर्य की जरूरत होगी।​ जब तक फिल्म अंतिम चरण में प्रवेश नहीं करती है, तब तक आपको सीट पकड़ने और दिमाग लगाने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी।

-कुलवंत हैप्पी

Leave a Reply