फिल्म मुबारकां : गुदगुदाने और भावुक होने का पूरा बंदोबस्त

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हो सकता है कि फिल्मकार अनीस बज्मी की मुबारकां का ट्रेलर आपको समझ में न आया हो। लेकिन, अनीस बज्मी की फिलम मुबारकां आपको एकदम समझ में आएगी क्योंकि अनीस बज्मी में फिल्म की शुरूआत में ही करण और चरण का परिचय देते हुए उलझन को सुलझा देते हैं।

करण और चरण दोनों जुड़वा भाई हैं, लेकिन, उनके माता पिता का देहांत हो चुका है। करण को उसकी बुआ और चरण को उसका ताउ गोद ले लेता है, ऐसे दो जुड़वा भाई कजिन बन जाते हैं।

करण लंदन में पला है जबकि चरण पंजाब में। करण अपनी गर्लफ्रेंड के पीछे पीछे पंजाब आता है। करण की सगाई कहीं और होने वाली है। करण अपनी जगह चरण को भेज देता है। चरण की अपनी एक गर्लफ्रेंड है। ऐसे में चरण भी इस शादी से बचना चाहता है।

कहानी आगे बढ़ती है, और अचानक उपजे हालातों में चरण की सगाई करण की गर्लफ्रेंड से होनी तय हो जाती है। अब करण और उसकी गर्लफ्रेंड स्वीटी इस उलझन से बाहर निकलना चाहते हैं। इस बीच करण की सगाई बिंकल से होनी तय हो जाती है। बिंकल वो ही लड़की है, जिसको देखने चरण लंदन जाता है।

अब किसकी शादी किससे होगी? चरण की गर्लफ्रेंड का क्या होगा? जानने लिए मुबारकां देखनी होगी।

अनीस बज्मी का निर्देशन सधा हुआ था। फिल्म के कुछ सीनों पर बेहतरीन तरीके से काम किया गया है, विशेषकर बहन भाई की खुन्नस वाले सीनों पर।​ फिल्मकार ने कलाकारों से बेहतरीन काम लिया। किसी एक स्टार पर फॉक्स करने की कोशिश नहीं की। हालांकि, अथिया शेट्टी के किरदार पर काम करने की जरूरत थी।

अनिल कपूर का किरदार​ फिल्म की जान है। अनिल कपूर करतार चाचू और मामू के किरदार में प्रभावित करते हैं। अर्जुन कपूर ने भी दोहरी भूमिका को अच्छे से निभाया है। ​इलियाना डिक्रूज का अभिनय भी सराहनीय है। इसके अलावा पवन मल्होत्रा और रत्ना पाठक शाह ने भी अपने किरदारों के साथ न्याय किया। उधर, नेहा शर्मा अतिथि भूमिका में होने के बावजूद प्रभावित करती हैं। अफसोस कि अथिया शेट्टी लीड भूमिका में होने के बावजूद निराश करती हैं। उनके हिस्से अधिक फुटेज नहीं आई।

अगर फिल्म की कमजोरी कड़ी की बात की जाए तो आप समझ नहीं पाएंगे कि बिंकल के साथ चरण को प्यार क्यों होता है? बिंकल और चरण में तो अधिक मुलाकातें भी नहीं होती। अचानक नफीसा का दिल मनप्रीत पर क्यों आता है? अगर नफीसा को चरण की ओर से सच्चा प्यार महसूस नहीं हो रहा था तो वो पंजाब से लंदन क्यों आती है?

लेकिन, ऐसी तमाम खामियों को निर्देशक ने हंसी मजाक और इमोशनल ड्रामे तले दबाने की भरपूर कोशिश की है, जो कहीं न कहीं सफल होती हुई नजर आई। फिल्म के गीतों की धुनें पंजाबियों की तरह लाउड हैं और गीतों के बोल समझ से परे हैं। तमाम खामियों के बावजूद भी फिल्म मनोरंजन करती है।

अगर आप लंबे समय से हंसे नहीं हैं और परिवार के साथ बैठकर सिनेमा हॉल में हंसने का मन है तो अनीस बज्मी की मुबारकां आपके लिए एकदम परफेक्ट फिल्म है। तीन स्टार की हकदार फिल्म मुबारकां का क्लाइमैक्स जबरदस्त है और सोशल मैसेज भी छोड़ता है।

फिल्म समीक्षा\कुलवंत हैप्पी

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