बात अभय देओल की भी ठीक है, जवाब उदय चोपड़ा का भी बुरा नहीं

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सोशल मीडिया पर बॉलीवुड के सितारे भी खुलकर मन की बात लिखने लगे हैं, जो एक अच्‍छी बात है। ऐसा होना भी चाहिये। हालांकि, बॉलीवुड के बड़े सितारे कुछ मुद्दों पर चुप रहना बेहतर समझते हैं, क्‍योंकि उनके बयान कभी कभी उनको आर्थिक नुकसान का सामना करने पर मजबूर कर देते हैं।

हाल ही में अभय देओल ने रंगभेद/नस्‍लभेद की बात करते हुए सौंदर्य निखार उत्‍पादों का प्रचार करने वाले फिल्‍मी सितारों को अपनी फेसबुक पोस्‍टों में खूब लपेटा। अभय देओल का मानना है कि सौंदर्य निखार उत्‍पादों का प्रचार करने वाले फिल्‍मी सितारे एक तरह से रंगभेद को बढ़ावा देते हैं।

इसके जवाब में सोनम कपूर, जो अभय देओल की एक पोस्‍ट में निशाने पर आ गई थीं, ने अभिनेत्री ईशा देओल की फोटो शेयर करते हुए अभय देओल को उलझाने की कोशिश की। लेकिन, सोनम कपूर बुरी तरह असफल रहीं क्‍योंकि अभय देओल ने उसको भी गलत करार दे दिया।

मगर, इस मामले में उदय चोपड़ा का जवाब कहीं ना कहीं अभय देओल की बहस को आगे बढ़ाता है। उदय चोपड़ा ने अपने ट्विटों में कहा, ‘फेयरनेस क्रीमों के बारे में यह क्‍या बकवास है। यदि फेयरनेस क्रीमें नस्‍लवादी हैं, तो बालों को रंग करना क्‍या है? यह व्‍यक्‍तिगत पसंद है, नस्‍लवादी नहीं है।’

एक अन्‍य ट्विट में मेरे यार की शादी है अभिनेता ने कहा, ‘यदि आपको जरूरत है तो इसका इस्‍तेमाल करो। यह कोई नस्‍लीय विषय नहीं है। यह एक आत्‍मसम्‍मान का मामला है। इसका इस्‍तेमाल न करें, यदि आप सोचते हैं कि आप ठीक हैं।’

लेकिन, अभय देओल की पोस्‍टें केवल सेलिब्रिटीज या फेयरनेस क्रीमों को लपेटे में नहीं लेती, बल्‍कि इनके विज्ञापनों को तैयार करने वाली सोच पर भी प्रहार करने की कोशिश करती हैं। जब अभय देओल लिखते हैं, ‘इस समय बहुत सारे अभियान चल रहे हैं, जो शोर शराबे के साथ, कभी कभी चुपके से, आपको अपना विचार बेच रहे हैं कि सांवलेपन से बेहतर गोरापन है। लेकिन, वहां पर आपको कोई भी यह बताने वाला नहीं है कि यह किसी को नीचा दिखाने वाला, गलत और नस्‍लीय है।’

इतना ही नहीं, अभय देओल लोगों जागरूक करने की कोशिश करते हुए कहते हैं, ‘आपको अपने स्‍वयं के लिए खुद देखना होगा। आप को किसी विचार के प्रभाव में आकर खुद को कुछ खरीदने से रोकना होगा, विशेषकर जो विचार एक रंग को दूसरे रंग से बेहतर बताने की कोशिश कर रहा हो।’

इसके अलावा अभय देओल ने विवाह संबंधी छापने वाले विज्ञापनों पर भी निशाना साधा, जिसमें किसी व्‍यक्‍ति के रंग रूप के बारे में पूछा जाता है। अभय देओल का मानना है कि ऐसे विज्ञापन रंगों के प्रति हमारी सोच को गलत दिशा में लेकर जाते हैं।

यकीनन, किसी भी उत्‍पाद का इस्‍तेमाल व्‍यक्‍तिगत मामला है, इसमें कोई दो राय नहीं, जैसा कि उदय चोपड़ा कह रहे हैं। लेकिन, दूसरी ओर उन विज्ञापनों का विरोध करना भी चाहिये, जो 100 प्रतिशत आंखों में धूल झोंकते हैं या मानवीय त्‍वचा रंगों के प्रति नये विश्‍वास स्‍थापित करने की कोशिश करते हैं, जैसे अभय देओल कह रहे हैं।

वैसे प्रचार में छलावा तो होता ही है, चाहे वो किसी फिल्‍म का प्रचार हो या फिर किसी उत्‍पाद का।

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