राम माधवानी की ‘नीरजा’ देखें या नहीं ?

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एक जांबाज फ्लाइट अटेडेंट नीरजा भनोट के जीवन पर आधारित फिल्म ‘नीरजा’ आज रिलीज हुर्इ। किसी व्यक्ति विशेष के जीवन पर आधारित फिल्म की कहानी तो पहले से ही बाजार में आ जाती है। इसलिए इस तरह की फिल्मों का पूरा भार प्रस्तुतिकरण पर टिका होता है। यदि फिल्म का प्रस्तुतिकरण बेहतरीन है तो दर्शक स्वयं को भाग्यशाली मानते हैं एवं निर्देशक से लेकर अदाकारों तक को शाबाशी देते हैं।

निर्देशक राम माधवानी ने भी इस बात को काफी गहरार्इ से समझा लगता है। फिल्म बनाते समय निर्देशक राम माधवानी ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है कि दर्शक बोरियत महसूस नहीं करें। फिल्म की कहानी तो बाजार में पहले से ही है कि नीरजा भनोट प्लेन के हाइजैक होने के बाद आतंकवादियों से लड़ती हुर्इ अपने प्राण त्याग देती है। उसका बलिदान कर्इ लोगों को जीवनदान देता है।

फिल्म की शुरूआत रोचक आैर सरल है। कुछ मिनटों के दौरान फिल्म बहुत सारी बातों को उम्दा तरीके से सामने रख देती है। फिल्म का एक बड़ा हिस्सा हवाई जहाज के अंदर फिल्माया गया है। इस तरह की फिल्म को बनाना अपने आप में एक बड़ी बात है। इसके लिए निर्देशक राम माधवानी, लेखक और फिल्म के संपादक मोनिषा को शाबाशी देना बनता है।

फिल्म को काफी भावुक बनाया गया है। घटनाक्रम के दौरान नीरजा के परिवार की स्थिति को भी बाखूबी बयान किया गया है। दर्शक बोरियत महसूस नहीं करें, इसलिए सुपर स्टार राजेश खन्ना की दीवानी नीरजा के जीवन में कुछ अन्य पहलूओं को फ्लैशबैक के जरिये जोड़ा गया है।

फिल्म निर्देशक राम माधवानी ने अपने निर्देशन कौशल से फिल्म की बहुत सारी कमियों को ढंक लिया है। हालांकि, इस फिल्म को कुछ छोटा किया जा सकता था। नीरजा में सोनम कपूर का अभिनय दर्शकों के मनों पर अमिट छाप छोड़ता नजर आ रहा है। शबाना आजमी के किरदार को अधिक सशक्त किया जा सकता था। हालांकि, अभिनय क्षमता से उन्होंने भरपार्इ करने की कोशिश की है। नीरजा के पिता के रोल में योगेन्द्र टिक्कू का अभिनय भी अच्छा था।

आधुनिक समय में बन रही फिल्मों से कर्इ गुना अच्छी है सोनम कपूर की नीरजा। हमारी राय है कि फिल्म देखनी चाहिए। हालांकि, फिल्म के संदर्भ में यह हमारी निजी राय है।